मंगलवार, 27 जनवरी 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .14)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .14


ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः |

प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत  १४ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Then, bewildered and astonished, his hair standing on end, Arjuna bowed his head to offer obeisances and with folded hands began to pray to the Supreme Lord.


भावार्थ

तब मोहग्रस्त एवं आश्चर्यचकित रोमांचित हुए अर्जुन ने प्रणाम करने के लिए मस्तक झुकाया और वह हाथ जोड़कर भगवान् से प्रार्थना करने लगा |


तात्पर्य

एक बार दिव्य दर्शन हुआ नहीं कि कृष्ण तथा अर्जुन के पारस्परिक सम्बन्ध तुरन्त बदल गये | अभी तक कृष्ण तथा अर्जुन में मैत्री सम्बन्ध था, किन्तु दर्शन होते ही अर्जुन अत्यन्त आदरपूर्वक प्रणाम कर रहा है और हाथ जोड़कर कृष्ण से प्रार्थना कर रहा है | वह उनके विश्र्वरूप की प्रशंसा कर रहा है | इस प्रकार अर्जुन का सम्बन्ध मित्रता का ण रहकर आश्चर्य का बन जाता है | बड़े-बड़े भक्त कृष्ण को समस्त सम्बन्धों का आगार मानते हैं | शास्त्रों में १२ प्रकार के सम्बन्धों का उल्लेख है और वे सब कृष्ण में निहित हैं | यह कहा जाता है कि वे दो जीवों के बीच, देवताओं के बीच या भगवान् तथा भक्त के बीच के पारस्परिक आदान-प्रदान होने वाले सम्बन्धों के सागर हैं |


यहाँ पर अर्जुन आश्चर्य-सम्बन्ध से प्रेरित है और उसीमें वह अत्यन्त गम्भीर तथा शान्त होते हुए भी अत्यन्त आह्दालित हो उठा | उसके रोम खड़े हो गये और वह हाथ जोड़कर भगवान् की प्रार्थना करने लगा | निस्सन्देह वह भयभीत नहीं था | वह भगवान् के आश्चर्यों से अभिभूत था | इस समय तो उसके समक्ष आश्चर्य था और उसकी प्रेमपूर्ण मित्रता आश्चर्य से अभिभूत थी | अतः उसकी प्रतिक्रिया इस प्रकार हुई |