मंगलवार, 13 जनवरी 2026

अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य (श्लोक 10 . 41)









अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य

श्लोक 10 . 41


यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा |

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंSशसम्भवम्  ४१ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Know that all opulent, beautiful and glorious creations spring from but a spark of My splendor.


भावार्थ

तुम जान लो कि सारा ऐश्र्वर्य, सौन्दर्य तथा तेजस्वी सृष्टियाँ मेरे तेज के एक स्फुलिंग मात्र से उद्भूत हैं |


तात्पर्य

किसी भी तेजस्वी या सुन्दर सृष्टि को, चाहे वह अध्यात्म जगत में हो या इस जगत में, कृष्ण की विभूति का अंश रूप ही मानना चाहिए | किसी भी अलौकिक तेजयुक्त वस्तु को कृष्ण की विभूति समझना चाहिए |