रविवार, 25 जनवरी 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .12)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .12


दिवि सूर्यसहस्त्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता |

यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः  १२ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

If hundreds of thousands of suns were to rise at once into the sky, their radiance might resemble the effulgence of the Supreme Person in that universal form.


भावार्थ

यदि आकाश में हजारों सूर्य एकसाथ उदय हों, तो उनका प्रकाश शायद परमपुरुष के इस विश्र्वरूप के तेज की समता कर सके |


तात्पर्य

अर्जुन ने जो कुछ देखा वह अकथ्य था, तो भी संजय धृतराष्ट्र को उस महान दर्शन का मानसिक चित्र उपस्थित करने का प्रयत्न कर रहा है | न तो संजय वहाँ था, न धृतराष्ट्र, किन्तु व्यासदेव के अनुग्रह से संजय सारी घटनाओं को देख सकता है | अतएव इस स्थिति की तुलना वह एक काल्पनिक घटना (हजारों सूर्यों) से कर रहा है, जिससे इसे समझा जा सके |