गुरुवार, 29 जनवरी 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .16)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .16


अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं 

पश्यामि त्वां सर्वतोSनन्तरूपम् | 

नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं 

पश्यामि विश्र्वेश्र्वर विश्र्वरूप  १६ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

O Lord of the universe, O universal form, I see in Your body many, many arms, bellies, mouths and eyes, expanded everywhere, without limit. I see in You no end, no middle and no beginning.


भावार्थ

हे विश्र्वेश्र्वर, हे विश्र्वरूप! मैं आपके शरीर में अनेकानेक हाथ, पेट, मुँह तथा आँखें देख रहा हूँ, जो सर्वत्र फैले हैं और जिनका अन्त नहीं है | आपमें न अन्त दीखता है, न मध्य और न आदि |


तात्पर्य

कृष्ण भगवान् हैं और असीम हैं, अतः उनके माध्यम से सब कुछ देखा जा सकता था |